“आपकी
प्रभा”
जीवन के सत्ताईस सालों ने प्रभा को जीवन के
सभी रंग दिखा दिये थे. प्रेम को छूकर
लौटी थी कभी, तो कभी विरहन बन
मीरा के गीतों को भी खुद जिया था उसने. उसने कभी सादगी से भी लम्हों को टटोला था, तो कभी चमकती रातों में शोर बन बैठी थी खुद
भी. इन सभी रंगों के बीच वह
उजले से कमरे में एक कुर्सी पर बैठी अपना अंतिम पत्र लिख रही थी, जिसे प्रेम पत्र कहने
में थोड़ी-सी हिचकिचाहट हो रही है
.....
“मैं वही प्रभा हूँ, वही जिसे तुमने एक बार
अपना कर माटी से चन्दन बना दिया था. प्रेम में धोखा खाकर जब मैं जीवन से ऊब चुकी थी, तुमने मुझमें फिर से जीने की ललक को ज़िंदा
कर दिया था. प्रेम तो
नहीं कह सकती हूँ, पर मैं तुमसे एक अटूट से रिश्ते में बंध गयी थी. तुम्हें याद होगा कि पहली बार हम मेरे जन्मदिन
पर मिले थे. उस दिन जब तुम आशीष के साथ मेरी पार्टी में आये थे तब तुमने सोचा भी नहीं होगा कि तुम्हारी मुलाक़ात
मुझसे होगी. पहले दिन से
ही तो हम दोस्त बन गए थे. तुम्हारी बातें मुझे अच्छी लगती थी. इतनी कि तुममे अपना सबसे अच्छा
दोस्त भी मिल गया था मुझे.. जब साहिल ने मुझे धोखा दिया तो मैं सिर्फ तुम पर भरोसा कर
पायी थी. माँ पापा के जाने के बाद तुमने ही जीवन को सँवारा और कई वजहें दी मुझे जीने
के लिए. मुझे वह दिन याद
है जब तुम मेरे घर गाजरों से भरी थैली ले आये थे और बोला था ख़राब हो रही थी मेरे यहाँ….. मैं समझ गयी थी कि तुम मुझसे हलवा बनवाना चाहते हो. मैं किचन में आकर बहुत
हँसी थी. तुम्हारा गाजर के हलवे का प्रेम आखिर जगजाहिर था..
तुम्हारे नज़रे हमेशा मुझमें प्रेम देखना चाहती
थी और सच मानो तो मैंने भी बहुत कोशिश की (अगर यकीन कर सको
तो)....
वह शादी का निमंत्रणपत्र, उसका फीका सा सफ़ेद रंग… मुझे बिलकुल भी
अच्छा नहीं लगा था (लाल सुर्ख रंग का शायद ज्यादा अच्छा लगता). सच बता रही हूँ, पर उस
दिन तुम इतना खुश थे कि मैं उसके डिज़ाइन को मना भी तो नहीं कर
पायी थी. चार साल हो गए
हमारी शादी को और तुम ज़रा भी नहीं बदले. तुम
किस मिट्टी के बने हो मुझे नहीं पता.
कितनी बार कोशिश करी तुमसे झगड़ा करने की पर तुम अपनी हलकी सी मुस्कुराहटों में
सारे उपाय छुपाकर बैठे रहते हो
...
तुमने कभी सोचा नहीं होगा कि यही प्रभा जो
तुम्हें रोज़ ये एहसास दिलाती है कि वह खुश है तुम्हारे साथ रोज़ अपराध बोध में जी रही
होगी. है ना.. शायद खुद से कहने
कि हिम्मत नहीं है इसलिए चिठ्ठी का सहारा ले रही हूँ. हमारी शादी के एक साल बाद फिर से मेरी
ज़िन्दगी में तूफ़ान आया था- साहिल नाम का. याद है तुम्हारा ट्रांसफर दिल्ली से
लखनऊ हो गया था और मैं खुश नहीं दिख रही थी, क्यूँकि मुझे पता था
साहिल भी अपनी नौकरी के सिलसिले में लखनऊ परिवार के साथ आ गया था.
पहला प्रेम पहली बारिश सा होता है. उसकी कशिश
चाहकर भी कम नहीं होती. मुझे पता है तुम विश्वास नहीं करोगे पर मैंने बहुत कोशिश की
साहिल से दूर रहने की, पर ना जाने क्यों
वह भी मुझे नहीं छोड़ पाया था.
मै तुममे साहिल को ढूंढ रही थी और वह शालिनी मै मुझे.. और जब नही मिला तो हमने फिर
से साथ होने का फैसला किया. 3 साल हमने इस प्रेम को जिया. ऐसा लगता था जैसेकि मैं कोई किरदार
निभा रही हूँ. इतना ढूब चुकी
थी कि उसके लिए कुछ भी कर सकती थी और तुम... तुम्हें क्या समझ नहीं आया कभी कि मैं
तुमसे कितने झूट बोल रही थी.शायद नहीं. मैं भी तो तुम्हारा पहला प्यार थी, मुझे पता है तुमने बताया नहीं पर जताया है
कई बार.. ये झलकते प्यार को महसूस
भी किया है कई बार मैंने,, यकीन करना मेरा..
तुम्हें छोड़ने का फैसला ज़हर लेने से मुश्किल
होता शायद, पर साहिल के साथ होने की कल्पना ये अधिकार भी मुझसे छीन लेती है. माफ़ कर देने के लायक नहीं हूँ, फिर भी ये बताना
चाहती हूँ कि अपने पहले प्रेम की सजा काट रही हूँ. नफ़रत से याद करोगे तब भी मुझे ख़ुशी
होगी. तलाक़ के बारे में वकील
ही बात करेगा, खुद से कहने
कि हिम्मत नहीं है मुझमे.
आपकी अपनी प्रभा
पर अब मैं शायद वह प्रभा नहीं रही (आपकी अपनी)..... मै नही जानती की अब
भी आपकी प्रभा लिखने का कोई अधिकार है भी मुझे या नही, फिर भी आपने मुझे जितना अपना माना था उसको याद
करते हुए ‘आपकी अपनी प्रभा’ लिखने का साहस कर रही हूँ …
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प्रभा ने उस लम्बे पत्र को वहीँ मेज़ पर एक खाली
गिलास के नीचे दबाकर पर रख दिया. घर की सीढियाँ नीचे उतरते हुए वह सोच रही
थी कि शायद 6 बजे ये पत्र पढ़ा जायेगा. थोड़ा वक़्त और मिलता तो शायद वह थोड़ा और लिख पाती.
पता नहीं शब्द और हिम्मत और जुटा पाती ... टैक्सी में बैठकर अपने पर्स से काँपते
हाथों से फ़ोन निकाला और साहिल को लगाया वह सोचते हुए कि शायद वह भी घर
से निकल गया होगा. टैक्सी वाला एयरपोर्ट के रास्ते में ट्रैफिक की शिकायतों में लगा
हुआ था और प्रभा उसकी बातें सुने बैगर अन्दर ही अन्दर एक अनजान डर, घबराहट के साथ
अपने से ही बातें किये जा रही थी. ..... साहिल ने शालिनी को बता
दिया होगा कि हम उनसे दूर जा रहे हैं. वह भी
बिखर गयी होगी. जैसे कभी मैं टूट कर बिखरी थी. क्या ये सही हो रहा है ...एक नहीं
कई सवाल उसके मन को और बैचैन कर रहे थे.
गाड़ियों के शोर से कहीं ज्यादा शोर उसके
अन्दर हो रहा था .....पर मन की दौड़ क्सिके पकड़ में. उसके मन ने पैतरा बदला और अगले
ही पल वो अपनी नयी ज़िन्दगी के लिए सोचने लगी. ख्याल आ रहा था कि तलाक़ के पेपर वाली
बातें अभी कर लेना ज्यादा अच्छा था. मुम्बई जाकर वहाँ से ये सब बातें करने में और मुश्किल
होगी.परसों साहिल का
फैसला था कि वह उसके साथ मुम्बई चले वही जहाँ उसकी नयी जॉब लगी थी. वहीं साथ रहकर तलाक़ के बारे में सोचेंगे.
एयरपोर्ट पर खड़ी वह परेशान हो गयी थी, बार बार कभी मोबाइल को देखती कभी एयरपोर्ट
पर लगी दीवार घड़ी को. जैसे बार बार समय देख कर कुछ सही हो जायेगा. या समय को थामना
चाहती थी . तभी उसके फ़ोन का
मैसेज टोन बजा... साहिल का मैसेज था.
सॉरी, इतना आसान नहीं है जितना लगता है. मैं शालिनी को कुछ भी नहीं बता पाया. सब बिगड़ जायेगा और वो माँ भी बनने वाली है. प्रभा मेरा यकीन करना उसने मुझे ये बात आज
सुबह बताई. तुम समझोगी ना...
इन सबका असर हमारे प्रेम पर नहीं पड़ेगा. इसका विश्वास रखना, कल वहीं मिलते हैं रोज़ वाले टाइम पर, अभी बात
नहीं कर सकता. सारे रिश्तेदार बधाई देने आये हैं.
प्रभा मानो बुत बन गयी थी. उसने फिर से वाल क्लॉक
देखी और घर को रवाना हुई. उसके हालात उस पतंग की तरह थे जिसके डोर कट चुकी हो और
वो खाली आसमान में भटक रही हो. एक बड़ा सन्नाटा उसके अन्दर हो गया था. उस सन्नाटे
को लेकर वो उसी दहलीज पर लौटी जिसको वो अभी चन्द घंटे पहले हमेशा के
लिए अलविदा कह आयी थी. घर पर लगे ताले को देखकर उसे सुकून मिला. शायाद पहली बार बन्द ताले ने नए रास्ते
खोले. टूटे पतंग की डोर सी वो सीधे उस मेज से जा लटकी जिसमें वो एक
ठंडी चिठ्ठी में अपने एक रिश्ते को दफन करके आई थी. उस कागज़ की टुकड़े को फाड़ते हुए
वो फूट फूट कर रोते हुए ज़मीन पर बिखर पड़ी. जब आँख खाली हो गयीं ...तो उस खालीपन के
साथ उसने उन कागजों के बिखरे टुकड़ों समेटना शुरू किया .....गोया अपनी ज़िन्दगी समेट
रही हो. उस के अन्दर के सन्नाटे को तोड़ते हुए फ़ोन की घंटी बजी.
प्रभा ने साँस गटकते हुए फ़ोन में बात शुरू
की...हेलो
हाँ प्रभा
ये आवाज़ सुनते ही ना
जाने प्रभा ने अपने अन्दर बहुत कुछ महसूस किया ... एक अपराध
बोध... एक माफ़ी एक शर्म.....और शायद आज एक बार फिर एक सहारा
भी...
बोलो.
मुझे ऑफिस से लौटने में थोड़ी देर हो जाएगी.
कोई नहीं... पर तुम जल्दी आने की कोशिश करना. मैं तुम्हारा फेवरेट गाजर
का हलवा बना रही हूँ. .....और.... तुम्हारी
फेवरेट साड़ी भी पहनी है आज. -- रिसते हुए ज़ख्म आखों से बह चले.
"अच्छा... फिर तो
और भी जल्दी आना होगा, प्रभा आई लव यू "
"आई लव यू टू ........"
एक अपराध बोध से सना, सहारे में लिपटा हुआ
एक एहसान का दुरा उसकी रगों में दौड़ पड़ा. इसकी बीच से अपने को समेटते हुए. एक नई
ज़िन्दगी का इरादा जैसा ही कुछ लिए प्रभा ने फ़ोन रखते हुए, अपने मोबाइल से सोहैल को मैसेज किया.....
“साहिल,, आज जब मै अपने
घर लौटी तो वही एयरपोर्ट पर बहुत कुछ छोड़ आयी, वह सामान जो छूटा तो लगा अच्छा है साथ
लेकर नही आई उसे. मै अपने घर लौट आई हु खाली हाथ,, इन खाली हाथो से ही अपने घर को सवार
पाऊँगी मै. तुमसे कोई शिकायत नही है”......
शालिनी और तुम्हें मुबारकबाद... मुझे इस धोखे (तुम्हारा या अपना क्या फर्क पड़ता है) से आज़ाद करने के लिए थैंक्यू.”
शालिनी और तुम्हें मुबारकबाद... मुझे इस धोखे (तुम्हारा या अपना क्या फर्क पड़ता है) से आज़ाद करने के लिए थैंक्यू.”
पहला प्रेम पहली बारिश सा होता है, पर कई बार तूफ़ान भी लाता है.. जिनसे उबरने में सदियाँ लग जाती हैं...... पर प्रभा के दिल में इस तूफ़ान की उथलपुतल
बहुत हद तक शांत हो चुकी थी…
Very well told :)
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